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🪶 पाठ 10: भारति, जय, विजयकरे ! • मेरी समझ मेरे विचार

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Q1

कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?

कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की प्रगाढ़ राष्ट्रीयता, देशप्रेम और भारतभूमि के प्रति अपार श्रद्धा की भावना अभिव्यक्त हुई है। वे भारत को एक देवी या साक्षात आराध्य मानकर उसकी 'जय-विजय' की कामना करते हैं।

Q2

कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?

  • प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन: कवि ने भारत का मानवीकरण करते हुए वन, पेड़ों और लताओं (तरु-तृण-वन-लता) को उसके वस्त्र, पवित्र गंगा की धारा को गले का उजला हार, हिमालय की बर्फ को मुकुट, और सागर को उसके चरण धोने वाला बताया है।
  • प्रकृति संरक्षण और देशप्रेम: हाँ, प्रकृति का संरक्षण पूर्णतः देशप्रेम का ही काम है। जिस प्रकृति (नदियाँ, पर्वत, वन) से हमारे देश की पहचान है और जो हमारे जीवन का आधार है, यदि हम उसे ही नष्ट कर देंगे (प्रदूषित करेंगे), तो यह देश की जड़ों को खोखला करने जैसा होगा। अतः पर्यावरण की रक्षा मातृभूमि की ही रक्षा है।
Q3

"कनक-शस्य-कमलधरे!" पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?

यह पंक्ति भारत की तीन प्रमुख विशेषताओं की ओर संकेत करती है:

  1. कनक (सोना/संपन्नता): भारत की आर्थिक संपन्नता और खनिज संपदा।
  2. शस्य (फसल/कृषि): भारत की समृद्ध कृषि-परंपरा, उपजाऊ भूमि और लहलहाते खेत।
  3. कमलधरे (कमल को धारण करने वाली): भारत की पवित्रता, सांस्कृतिक सौंदर्य और प्राकृतिक छटा (कमल को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है)।
Q4

"मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?

भारत के सबसे उत्तर (शीर्ष) पर स्थित हिमालय पर्वत साल भर सफेद (शुभ्र) बर्फ (हिम-तुषार) से ढका रहता है। जिस प्रकार किसी राजा या देवी के मस्तक पर सुशोभित चमकता हुआ मुकुट उनके गौरव और गरिमा का प्रतीक होता है, उसी प्रकार हिमालय भारत के मस्तक पर विराजमान एक प्राकृतिक, उज्ज्वल और अभेद्य मुकुट के समान है जो देश के गौरव को बढ़ाता है और उसकी रक्षा करता है।