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"अब कैसे छूटै राम रट लागी" पंक्ति का भाव है?
सही उत्तर: (ग) आराध्य का नाम जपना।
यहाँ 'राम रट' का अर्थ आराध्य (ईश्वर) के नाम का निरंतर स्मरण और जप करने की लगन से है, जो अब भक्त (रैदास) से छूट नहीं सकती।
"प्रभु जी तुम चंदन हम पानी" पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
सही उत्तर: (क) एकाकार और समरूप।
जिस प्रकार पानी में घिसने पर चंदन पानी के अंग-अंग में समाकर उसे सुगंधित कर देता है, उसी प्रकार प्रभु की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समाकर उसे एकाकार और पवित्र कर देती है।
"तुम दीपक, हम बाती" से रैदास का क्या भाव है?
सही उत्तर: (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
जिस प्रकार दीपक में जलने वाली बाती प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार भक्त ईश्वर (दीपक) के प्रेम में जलकर (दिन-रात समर्पित रहकर) अपना जीवन आलोकित करता है।
"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
सही उत्तर: (ख) आराध्य से अटूट संबंध।
भक्त रैदास स्पष्ट कहते हैं कि चाहे ईश्वर उनसे संबंध तोड़ लें, लेकिन वे अपनी ओर से ईश्वर से जुड़ा यह अटूट प्रेम का नाता कभी नहीं तोड़ेंगे।
"तीरथ बरत न करूँ अंदेसा" पंक्ति से आप क्या समझते हैं?
सही उत्तर: (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
रैदास कहते हैं कि उन्हें किसी तीर्थ या व्रत पर विश्वास (अंदेसा/आशंका) नहीं है, उन्हें केवल अपने आराध्य (प्रभु) के चरण कमलों का ही एकमात्र भरोसा और आश्रय है।
सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?
सही उत्तर: (क) "जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा"।
यह पंक्ति दर्शाती है कि ईश्वर कण-कण में विद्यमान है (सर्वव्यापक है), इसलिए भक्त जहाँ भी जाता है, उसे केवल अपने आराध्य की ही उपस्थिति और पूजा दिखाई देती है।
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।"
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।
(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।"
"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
दोनों पदों में रैदास ने भक्त और आराध्य के संबंध को बहुत ही सुंदर लौकिक प्रतीकों और उपमाओं से व्यक्त किया है:
अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
| अलंकार | पंक्ति का उदाहरण (रैदास के पदों से) |
|---|---|
| अनुप्रास अलंकार | "अब कैसे छूटै राम रट लागी" ('र' वर्ण की आवृत्ति) |
| उपमा अलंकार | "जैसे चितवत चंद चकोरा" / "जैसे सोने मिलत सुहागा" |
| रूपक अलंकार | "तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां" (चरणों को सीधे कमल का रूप दिया गया) |
इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए।
| विशेषता | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|
| अनन्य भक्ति भाव | "मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।" / "जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ..." |
| सरल और लोकधर्मी भाषा | "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा" / "सबही पहर तुम्हारी आसा" |
| उपमा और तुलना | "प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा" / "प्रभु जी तुम मोती, हम धागा" |
तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?
"सोने मिलत सुहागा" - 'सुहागा' एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। 'सुहागा' का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए। (शब्द: मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत)
| रैदास के शब्द | आधुनिक/सामान्य प्रयोग वाले शब्द |
|---|---|
| मोरा | मोर / मयूर |
| चकोरा | चकोर (तीतर की जाति का एक पक्षी) |
| बाती | बत्ती / रूई की बत्ती |
| राती | रात / रात्रि |
| सोने | सोना / स्वर्ण |
| तीरथ | तीर्थ / पुण्य स्थान |
| बरत | व्रत / उपवास |
कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
संवाद-लेखन:
"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
लघुकथा: अटूट मित्रता
रामू और श्यामू बचपन के अभिन्न मित्र थे। एक बार किसी गलतफहमी के कारण श्यामू ने रामू से बात करना बंद कर दिया और उससे रिश्ता तोड़ने की ठान ली। श्यामू जब भी रामू को देखता, रास्ता बदल लेता। लेकिन रामू ने कभी बुरा नहीं माना। जब श्यामू बीमार पड़ा और उसे खून की सख्त जरूरत थी, तो रामू बिना सोचे समझे अस्पताल पहुँचा और अपना खून देकर उसकी जान बचाई। होश आने पर श्यामू रोते हुए बोला, "मैंने तो तुमसे सारे रिश्ते तोड़ दिए थे, फिर तुम क्यों आए?" रामू ने मुसकरा कर कहा, "दोस्ती तुमने तोड़ी थी, मैंने नहीं! जो तुम तोड़ो, मैं नहीं तोड़ूँगा।" यह सुनकर श्यामू को अपनी गलती का अहसास हुआ और उनकी मित्रता पहले से भी अधिक गहरी हो गई।
अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?
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