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🪶 पाठ 9: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद • मेरे उत्तर मेरे तर्क

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Q1

"पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।" यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?

  1. (क) आदर और सम्मान
  2. (ख) भक्ति और श्रद्धा
  3. (ग) भय और शिष्टाचार
  4. (घ) प्रेम और सहिष्णुता

सही उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार।

परशुराम का भयंकर रूप (बेषु कराला) देखकर सभी राजा भयभीत (भय बिकल) हो गए और डर के कारण शिष्टाचारवश अपने पिता और अपना नाम ले-लेकर उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगे।

Q2

"जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा" पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?

  1. (क) संवेदनशीलता
  2. (ख) शिष्टता
  3. (ग) सहनशीलता
  4. (घ) उदासीनता

सही उत्तर: (ख) शिष्टता।

राजा जनक द्वारा परशुराम को सिर झुकाकर प्रणाम करना और सीता को बुलाकर उनसे भी प्रणाम करवाना उनके विनम्र और शिष्ट आचरण को दर्शाता है।

Q3

"अति रिस बोले बचन कठोरा।" जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-

  1. (क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
  2. (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
  3. (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
  4. (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

सही उत्तर: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना।

परशुराम शिव के अनन्य भक्त थे। सभा में शिव-धनुष के टुकड़े (चापखंड) धरती पर पड़े देखकर वे अत्यधिक क्रोधित (अति रिस) हो गए और जनक से कठोर वचन बोले।

Q4

राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा" उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?

  1. (क) कूटनीति और चतुराई
  2. (ख) विनम्रता और मर्यादा
  3. (ग) त्याग और समर्पण
  4. (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

सही उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा।

स्वयं शिव-धनुष तोड़ने वाले पराक्रमी होते हुए भी, श्रीराम ने अत्यंत शांत भाव से स्वयं को परशुराम का दास कहा, जो उनकी असीम विनम्रता, शील और मर्यादा का सूचक है।

Q5

"सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।" लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?

  1. (क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
  2. (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
  3. (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
  4. (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

सही उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

लक्ष्मण को लगा कि एक पुरानी धनुही के टूटने पर परशुराम का इतना क्रोध करना अनुचित है। वे परशुराम के अहंकार को चुनौती देने और उनका उपहास करने के लिए व्यंग्यपूर्ण वचनों का प्रयोग कर रहे थे।