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🪶 पाठ 9: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद • भाषा से संवाद

Verified step-by-step solutions for your class notes.

Q1

इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे- दोहा-चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उनका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि। नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।

  • अनुप्रास अलंकार (एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति) - उदाहरण: अरि करनी करि करिअ लराई
  • अतिशयोक्ति अलंकार (बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना) - उदाहरण: अरध निमेष कलप सम बीता
  • रूपक अलंकार (रूप का आरोपण करना) - उदाहरण: पद सरोज मेले दोउ भाई

अन्य उदाहरण:

विशेषताअन्य उदाहरण
अनुप्रास अलंकार"कहि कहि निज नामा" ('क' वर्ण की आवृत्ति)
अतिशयोक्ति अलंकार"सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" (सहस्रबाहु के समान भयंकर शत्रु मानना)
रूपक अलंकार"भृगुकुलकेतू" (भृगुवंश रूपी ध्वजा)
Q2

यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है... कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए।

अवधी शब्दखड़ी बोली का शब्द
कोहीक्रोधी
बेषुवेष / वेशभूषा
लरिकाईलड़कपन / बचपन में
रिसक्रोध / गुस्सा
आयसुआज्ञा / आदेश
Q3

नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। (शब्द: राम, राजा, बात, सिरु)

शब्दलोकोक्तिअर्थ एवं वाक्य प्रयोग
मनमन के हारे हार है, मन के जीते जीत।अर्थ: आत्मविश्वास से सफलता मिलती है।
वाक्य: परीक्षा कठिन है पर मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
रामराम भरोसे हिंदू होटल।अर्थ: कार्य भगवान के भरोसे छोड़ देना।
वाक्य: उस दुकान का तो राम भरोसे हिंदू होटल वाला हाल है।
राजाकहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली।अर्थ: दो असमान स्तर के व्यक्तियों की तुलना।
वाक्य: उस सेठ और इस मजदूर की तुलना कैसी, कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली।
बातबात का बतंगड़ बनाना।अर्थ: छोटी सी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ा देना।
वाक्य: कुछ लोगों को छोटी सी बात का बतंगड़ बनाने की आदत होती है।
सिरु (सिर)सिर मुँडाते ही ओले पड़ना।अर्थ: कार्य आरंभ करते ही बाधा उत्पन्न होना।
वाक्य: नई दुकान खोली और लॉकडाउन लग गया, इसे कहते हैं सिर मुँडाते ही ओले पड़ना।
Q4

नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-
"अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।"

गद्य-रूप:

अत्यधिक डर के कारण राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं। (यह देखकर) कुटिल स्वभाव वाले राजा अपने मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहे हैं। देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुषों के हृदय में बड़ा भारी भय समा गया है और वे सभी गहरी चिंता में डूब गए हैं।